इंसान हूं आखिर कब तक झेल सकता हूं। लिखना तो नहीं चाहिए, लेकिन जब
लिखना हो और बोलना हो तो चुप रहना भी नहीं चाहिए। वक्त के हिसाब से अगर इंसान
लिखता-बोलता रहे, तो वो समाज के हित में होता है। खबर-मंडी से सिसकती-बिलखती, खुद
का बलात्कार कराये हुए एक “खबर” आ रही है, कि ‘न्यूज-नेशन’ नाम के देश के नंबर-वन (कथित तौर पर
नंबर-1) खबरों के एक ‘अड्डे’ में बड़ा गड़बड़झाला हो गया है। गड़बड़झाला यूपी के बुलंदशहर जिले
में रखे गये स्ट्रिंगर-महाश्य को लेकर (दो लोग) हुआ है।
Showing posts with label News Channel. Show all posts
Showing posts with label News Channel. Show all posts
Sunday, 8 March 2015
Friday, 13 April 2012
बेकाबू-बाबा की “ब्रेकिंग” के बबंडर पर, उनकी चुप्पी का मतलब!
![]() |
| निर्मल बाबा-शुक्रिया न्यूज-चैनलों तुम्हारी "बंदरबाट" के लिए |
संजीव चौहान
नींद से बोझिल आंखों को सुबह-सुबह होश में लाने की कोशिश कर ही रहा था। इतने में पत्नी ने कंधा झिंझोड़ डाला। नींद से बोझिल एक आंख खोलकर बीबी की ओर खिसियाई हुई नज़र से देखा। हाथ में अखबार लिए जमी हुई थीं। बोली मुझे मत घूरो। अखबार पढ़ो। “ब्रेकिंग-न्यूज” है।
क्या मजाक करती हो सुबह-सुबह? अखबार में कहां से “ब्रेकिंग” का भूत आ गया? ब्रेकिंग का “पेटेंट” तो भारत में “न्यूज-चैनलों” ने करा रखा है। अखबार तो “विशेष”, “एक्सक्लूसिव”, “खास-खबर”, “विशेष-रिपोर्ट” या “रपट” जैसे पुराने जमाने के अल्फाजों का ही इस्तेमाल करते हैं।
पत्नी बोलीं, ये बहस का मुद्दा नहीं है। “ब्रेकिंग” और “विशेष” के झगड़े से बाहर निकलो। अखबार में छपी मतलब की खबर पढ़ो। देश में कोई और “बबाली-बाबा” पैदा हो गया है। डबल रोटी, मख्खन, टोस्ट, कोल्ड-ड्रिंक से सबकी “सेवा” कर रहे हैं ये बाबा। “मुसीबत” में फंसे “गरीब” लोगों से ये बाबा “दक्षिणा” भी कोई ज्यादा नहीं ले रहा है। मात्र 2 हजार रुपये।
पत्नी इतना सब बोल चुकीं थीं, कि अब हमें अखबार में छपी बाबा से संबंधित खबर पढ़ने की जरुरत ही नहीं रही। हमने पूछा कि अखबार की उस खबर में अब बाकी क्या बचा है? जिसे पढ़ाने के लिए तुमने हमारी नींद हराम कर दी। पत्नी बोली- बाबा के जन्म की खबर इतनी बड़ी “ब्रेकिंग” न्यूज नहीं है, जितना इस “बबाली-बाबा” को लेकर न्यूज चैनलों में मची उठा-पठक की खबर है।
चूंकि न्यूज चैनल में नौकरी की हिस्सेदारी मेरी भी है। सो जैसे ही न्यूज चैनल में किसी “ब्रेकिंग” को लेकर शुरु हुए बबंडर की बात कान में पड़ी, तो नींद खुल गयी। अखबार में तो सिर्फ इतना ही पढ़ने को नसीब हुआ, कि देश में एक नये बबाली बाबा का जन्म हो गया है। इन बाबा के घर, आश्रम और चेलों में तो कोई भगदड़ और शोर-शराबा नहीं है। हां, न्यूज चैनलों में घमासान जरुर छिड़ गया है। एक “अरबपति” बाबा को लेकर देश के न्यूज चैनल “दो-फाड़” हो गये हैं।
![]() |
| "फोकट" की पब्लिकसिटी का कारोबार |
एक पक्ष में वे न्यूज चैनल हैं, जो बाबा की “ओछी” हरकतों को उजागर करके खुद को जनता का जागरुक और हमदर्द “नुमाइंदा” साबित करने पर उतारू हैं। दूसरे पक्ष में वे न्यूज-चैनल शामिल हैं, जो “विज्ञापन” के लालच में बाबा को “बाप” बनाने पर तुले हैं। बाबा अगर “विज्ञापन” और “टीआरपी” दें, तो हम “लंगोट” में भी दुनिया भर में बाबा की “बम-बम” गुंजाने (गुंजवाने) में शर्म नहीं करेंगे।
“अरबपति” बाबा को लेकर देश का चौथा खंभा (मीडिया, मीडिया में भी सिर्फ न्यूज-चैनल) ज़मीन से उखड़ने पर उतारू था। जिधर देखिये। उधर ही कुछ न्यूज चैनलों पर बाबा का विज्ञापन दिखाई दे रहा था। तो दूसरी ओर कुछ न्यूज चैनलों पर बाबा की ठगी पर विशेष कार्यक्रम।
![]() |
| टीआरपी और दाम के लिए कुछ भी कर गुजरेंगे |
इस “बबाली-बाबा” के मुद्दे पर पूरे देश में चारों ओर शोर-शराबे के माहोल में भी कहीं अगर खामोशी और शांति थी, तो न्यूज-चैनलों में “कंटेंट” की कथित ठेकेदारी करने वाले “महारथियों” के खेमे में। जो बबाली बाबा की कथित “पैदाईश” से चंद दिन पहले तक “इलेक्ट्रॉनिक-मीडिया” की दुनिया में ताल ठोंक रहे थे। कुछ भी हो जाये, चैनल में ऊट-पटांग “कंटेंट” बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।
Sunday, 8 April 2012
ब्रेकिंग के बादशाह हो गये "ब्रेक"
माफ करना जरदारी...तुम्हारे “लंगोट” का रंग नहीं पता कर पाये!
-संजीव चौहान-
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी मय लाव-लश्कर के 8 अप्रेल 2012 को भारत पहुंच गये। जिन जरदारी और उनके देश को हम पानी पी-पीकर सौ-सौ गालियां एक सांस में देते हैं, उनके लिए देश के “हुक्मरान” पलक-पांवड़े बिछाये राहों में खड़े थे। उन जरदारी साहब के लिए हमारे हुक्मरानों ने, वो सब शाही व्यंजन (56 भोग) खास- खानसामाओं की फौज से तैयार करवा लिये, जिनकी सेना ने कारगिल में भारत की उन तमाम नव-विवाहिताओं के सिंदूर पोंछ दिये थे, जिनके हाथों की मेंहदी का रंग अभी फीका भी नहीं पड़ा था।
उन बहनों के हाथों की कलाईयां हमेशा के लिए सूनी कर दीं, जिनका इकलौता भाई भारतीय फौज में ट्रेनिंग के बाद पहली पोस्टिंग पर ही कारगिल की लड़ाई में झोंक दिया गया। और वो जरदारी की(पाकिस्तानी) सेना के हाथों बे-मौत मारा गया।जरदारी के “बे-हया वेलकम” के कड़वे सच को देख-सुनकर देश के उन सपूतों की मां दिल्ली से दूर गांव में पुराने बरगद, पाकड़ और पीपल के पेड़ों के नीचे, गांव के कुएं पर बैठी आंसू बहा रही थीं, 8 अप्रेल 2012 को, जिनके लाल कारगिल में बे-मौत देश के हुक्मरानों ने शहीद करा दिये। जिन “लालों” की बेबाओं का पुरसाहाल लेने वाला आज कोई हुक्मरान नहीं है। कोई बड़ी बात नहीं, कि कारगिल के कुछ शहीदों के बच्चों को आज सरकारी स्कूल की फीस भी नसीब न हो रही हो। ऐसे जरदारी की सेवा में गर्दन झुकाये खड़े थे...हमारे देश के वजीर-ए-आजम मन मोहन सिंह के हुक्म पर मंत्री पवन बंसल। बिलख पड़ीं होंगी कारगिल में शहीद हुए युवा लड़ाकों की मां,पत्नी और मासूम बच्चे। न्यूज चैनलों पर ये सब देखकर।
रही-सही कसर पूरी कर दी, देश के उन न्यूज चैनलों ने, जो कारगिल युद्ध के बाद आज तक कभी नहीं पहुंचे होंगे उस गांव में, जिसका “लाल” हंसते-हंसते कारगिल में शहीद हो गया। आज किस हाल में ज़िंदगी बसर कर रहा है, उस शहीद सैनिक का परिवार। उस परिवार की बदहाल ह़कीकत को चैनल पर बार-बार ब्रेकिंग दिखाने के लिए। कभी किसी न्यूज चैनल ने नहीं किया होगा, उस गांव का रुख।
जरदारी के पीछे-पीछे देश के हुक्मरान “घिसट” रहे थे। ये कोई नई या हैरंतगेज जानकारी नहीं है। हमारे देश के सत्ता के गलियारों की ये पुरानी परिपाटी है...कि देश में आने पर दुश्मन को घी पिलाओ। ताकि अपनी सर-ज़मीं पर जाकर वो आंख तरेर कर हमें ही हमारे घी की ताकत का अहसास करा सके। और हम उसे दुनिया भर की नज़र में “अपना दुश्मन” साबित करने के लिए अरबों रुपया खर्च करें। वो रुपया जिसे आम-आदमी के नमक, मिट्टी के तेल, दाल-चावल पर टेक्स लगाकर “कमाया” गया है।देश के न्यूज चैनल भी कदम-ताल मिलाकर जरदारी के पीछे-पीछे ऐसे घिसट रहे थे, मानो कलियुग में भगवान राम स-शरीर धरती पर उतर आये हों। उनकी एक झलक दिखाने के लिए चैनल के स्टेट-ब्यूर चीफ ने एक सप्ताह पहले ही बजट और प्लान बनाकर दिल्ली,नोएडा में मौजूद अपने “सर” को भेज दिया। ताकि जरदारी के तलबों से उड़ने वाली धूल की कवरेज (वीजुअल) भी लाइव ऑन-एअर करवाई जा सके।
इतना भर होता तो झेल लेते। हद तो तब हो गयी, जब नींद के मारे सरकारी हुक्मरानों से हमारे न्यूज चैनल “ब्रेकिंग” के फेर में इस हद तक “ब्रेक”(टूट) हो गये, कि जरदारी के कपड़ों के भीतर तक जा पहुंचे। मसलन जयपुर पहुंचने पर जरदारी ने सूट उतारकर, ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर जाने के लिए कुरता-पाजामा पहन लिया। कुरता-पाजामा प्रेस करने के लिए बाकायदा अलग से एक प्रेस करने वाला बुलाया गया।
मैं दण्डवत हूं देश की सत्ता को नाकों चने चबबाने का कथित दावा करने वाले उन निजी न्यूज चैनल और उनके कथित कर्ता-धर्ताओं का, जिन्होंने जरदारी का कुछ भी दिखाने में कोताही नहीं बरती। फिर भी इतना करते-धरते चूक हो ही गयी। ब्रेकिंग के बादशाह कुछ कथित न्यूज चैनलों से। और वो चूक थी...जरदारी के “अंडरवियर” या “लंगोट” का रंग पता न कर पाने की। अगर कुरता-पाजामा के साथ साथ जरदारी के “लंगोट” के भी वीजुअल मिल जाते, तो शायद एक्सक्लूसिव वीजुअल की दुनिया में ये कलंक तो न लगता भारतीय न्यूज चैनलों के माथे पर...कि जरदारी के लंगोट का वीजुअल नहीं मिल पाया...।
Subscribe to:
Posts (Atom)




