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Monday, 20 June 2011

मुंबई की रात का सच

         अपना सांप, अपनी आस्तीन और सच का सामना

मैं अब तक मुंबई सिर्फ एक बार गया हूं। बिहार को भारत के नक्शे पर और टीवी में देखा है। अखबार, किताब और इतिहास में बिहार को पढ़ा है। इसके अलावा बिहार के बारे में थोड़ा-बहुत कागजी ज्ञान मुझे हो सकता है। मेरे इस कागजी ज्ञान या टूटी-फूटी जानकारी को बिहार पर या बिहार के बारे में मेरी 'विशेष-योग्यता' भी समझने की गलती मत कर बैठिये। कहने का मतलब साफ है, कि मुंबई और बिहार से मेरा कोई खास ताल्लुक या वास्ता नहीं रहा है। या यूं समझिये की न मैं 'बिहारी'  हूं न 'महाराष्ट्रीयन'। वैसे भी क्षेत्रवाद, भाषावाद की राजनीति में मेरा ज्ञान शून्य है। अब आइये मुद्दे की बात पर। आखिर मैंने ऊपर सिर्फ बिहार-मुंबई को लेकर ही क्यों लिख दीं इतनी लाइनें ? मैंने इन लाइनों को लिखने में समय खराब किया और आपने पढ़ने में। नहीं ऐसा बिलकुल मत सोचिये। हर लिखे का कोई मायने होता है।
यहां बात मुंबई और बिहार की राजनीति की नहीं हो रही है। न किसी को ऊंचा करने और न किसी को नीचा दिखाने की बात है। बात है तो सिर्फ उसूलों की। उसूल भी मेरे या आपके नहीं, शिवसेना के। जिसके मुखिया हैं बाल ठाकरे। अब ये ठाकरे भी कई हिस्सों में बंट गये हैं। परिवार में हर ठाकरे का अपना नाम-काम और अपनी ठसक है। यानी खानदान के सब जिम्मेदारों की अपनी अपनी अलग अलग जिम्मेदारियां। या यूं कहें कि जितनी जिम्मेदारियां उससे ज्यादा जिम्मेदार। शिवसेना का मुख्यालय है मुंबई में। शाखायें और सैनिक फैले हैं देश भर में। देश में जब कहीं किसी चौराहे पर, भीड़ भरे बाजार में, आलीशान इमारत में किसी की इज्जत की धज्जियां उड़वानी हो, तो सेना के सिपाहियों को इशारा भर कीजिए और तमाशे की शूटिंग शुरू। बिना किसी खास बंदोवस्त या इंतजाम के। सिर्फ हाथ-पैर, लात-घूंसों, लाठी-डंडों, ईंट-पत्थरों से। सिर्फ अपने देश की सीमा-रेखा में। किसी दूसरे देश में नहीं। यहां तक कि अपने ही देश में भी मुंबई की सीमा के अंदर। उसके बाहर कहीं नहीं। अर्थात अपने ही देश के किसी अन्य सूबे की सीमा के भीतर नहीं। कहने का मतलब- घर के शेर-बाहर ढेर।
मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 8 मार्च को एक 'संगीत बार-क्लब' पर छापा मारा। यह बार-क्लब (डांस-बार) मुंबई के मश्हूर इलाके पश्चिमी सांताक्रूज में है। बार, पर छापामारी रात एक बजे की गयी। बार में असामाजिक तत्वों की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि पुलिस टीमों को बार की एक दीवार तोड़कर उसके अंदर घुसना पड़ा। मौके पर मुंबई पुलिस को नौ 'बार-गर्ल्स' (डांसर) और तीन कर्मचारी मिले। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस की कहानी सही माने तो,  छापे से पहले ही बार मालिक मौके से फरार हो गया। यानी जैसा पुलिस छापों की कार्यवाही में देश भर में अक्सर होता है। 'तीन गिरफ्तार, एक फरार।' या मुठभेड़ के बाद की कहानियों में अक्सर पुलिस अगले दिन अखबारों में छपवाती है- 'एक बदमाश ढेर, दो अंधेरे का लाभ उठाकर भागने में कामयाब रहे। उनकी तलाश जारी है।'

डांस बार से पकड़ी गयी लड़कियों और कर्मचारियों से आधी रात को थाने में पूछताछ की गई। पता चला कि डांस बार मुंबई के किसी 'भाई, गुंडा या अंडरवर्ल्ड सरगना के किसी गुर्गे का नहीं, बल्कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के पोते का है', तो पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गयी। अब तब तक पुलिस रोजनामचे में डांस बार पर छापे की कहानी दर्ज कर चुकी थी। डांस बार के मालिक के रूप में जब सेना के साहब यानी बाल ठाकरे के पोते का नाम सामने आया, तो मुंबई क्राइम-ब्रांच की छापा मारने वाली टीम को पूरी कार्यवाही ही गले की फांस बनती नज़र आने लगी। शिवसेना के लिए ये मामला ऐसा बन गया, मानो उसने अपना सांप मारकर खुद ही गर्दन में लटका लिया हो। या यूं समझिये कि सपेरे से बेकाबू हुआ सांप, डसने के लिए सपेरे के ही पीछे पड़ गया हो।
मामला शिवसेना के सर्वे-सर्वा बाल ठाकरे के पोते से जुड़ा था। ये खबर अगले दिन अखबार की सुर्खी होनी थी, सो हुई। इसके विरोध में न सेना के सिपाही ही महाराष्ट्र और मुंबई की सड़कों पर उतरे, न किसी चैनल के दफ्तर पर पथराव करके शीशे चकनाचूर किये गये और न किसी का सिर फूटा। न किसी चैनल के खोजी पत्रकार ने इस खबर को ब्रेकिंग-एक्सक्लूसिव बनाकर देश की जनता के सामने दिन-रात परोसा। सेना की नज़र से अगर सोचें तो कुल मिलाकर नाक कटवाने वाला अपना ही तो था, फिर किसकी खबर और कैसी खबर, किससे सिर फुटव्वल और भला क्यों?  ये तो एक डांस बार में आधी रात को लड़कियां नचवाने की बात थी। अगर अपना सिपाही सौ खून भी करे, तो भला किसी से माफी मांगने थोड़ा ही जाया जायेगा। अपना सूबा, अपनी सेना, अपने सिपाही और अपना स्टेशन (पुलिस थाना)। मैंने इंटरनेट पर शिवसेना का मुखपृष्ठ 'सामना' कई बार खंगाल डाला। हर बार नज़र के सामने से शिवसेना प्रमुख के पोते के डांस-बार पर आधी रात को पड़े पुलिस छापे की खबर नदारद। आखिर को इसे भी अपनी आंखों का धोखा या यूं कहिये कमजोर नजर का असर, समझकर खुद को ही कोसकर, अपने मन को समझा लिया।
खबर का असर होना था, लेकिन हुआ नहीं। पुलिस को प्रेस-कांफ्रेंस आयोजित कराकर आरोपियों का जुलूस निकलवाना था, लेकिन निकलवाया नहीं। डांस बार में आधी रात को लड़कियां नचवाने की बात सामने आने पर अगले दिन मुंबई में शिवसेना का जलवा दिखना चाहिए था, लेकिन दिखा नहीं, वेलेंटाइन-डे या उससे एक दिन पहले जैसी नंगई होनी थी, लेकिन हुई नहीं। आखिर क्यों?  जब बिहार के छात्र राहुल राज को मुंबई में दिन-दहाड़े बस अपहरणकर्ता बताकर करीब से मुंबई पुलिस ने गोली मारकर ढेर कर दिया, यूपी के टैक्सी ड्राइवरों को मराठी भाषा न बोलने पर सड़कों पर पीटा गया, माई नेम इज खान बनाने पर शाहरुख खान का जीना मुहाल कर दिया गया, बॉलीवुड एक्टर सैफ अली खान को 'टपोरी' की संज्ञा से नवाजा गया, वेलेंटाइन-डे के मौके पर पार्कों में बैठकर बातचीत करते लड़के-लड़कियों की सरेआम बेइज्जती की जाती है। बस इतना ही फर्क जानता हूं मैं मुंबई और बिहार में। न मैं बिहार का हूं न मुंबई का। मेरी नज़र में शायद यही हो सच का सामना।

क्राइम-रिपोर्टिंग की क्लास का "कैंसर"

 गुरु-घंटाल                चेला                    "महा-काल"
आजकल 'मीडिया'  में (अखबार, न्यूज चैनल) रिपोर्टर बनने और रिपोर्टर बनाने वालों की भीड़ है। एक के पीछे दस-दस। क्राइम रिपोर्टर बनने के शौकीनों पर आगे चर्चा कर लेंगे। पहले क्राइम-रिपोर्टर बनाने वालों का गुणगान कर लिया जाये। क्राइम रिपोर्टर बनाने वाले कुछ मठाधीश कई अखबार और न्यूज-चैनलों के दफ्तर में या फिर दफ्तरों के बाहर गुमटियों पर मुंह में तम्बाकू, पान चबाते, यहां-वहां भटकते मिल जायेंगे। कुछ श्रीमान क्राइम रिपोर्टर बनने के इच्छुकों को प्रेस-क्लब में या उसके बाहर बुला लेते हैं। दिल्ली में आईएनएस बिल्डिंग के नीचे या फिर हाईटेक सिटी नोएडा में स्थित फिल्म सिटी में चैनल के दफ्तरों के बाहर चाय-पान के ठीये (अड्डे) भी क्राइम-रिपोर्टर बनाने के अड्डे के रुप में बदनाम हैं। अगर कहीं नहीं तो फिर अपने कार्यालय के ही बाहर ही सही।
जिसको जहां, जैसी सुविधा। संभव है कि जिस जिले में महाशय रह रहे हैं या जिस जिले के रहने वाले हों, उन्हें उस जिले में मौजूदा समय में थानों की संख्या भी सही-सही न मालूम हो। फिर भी वे अपने पीछे-पीछे क्राइम रिपोर्टर बनने के इच्छुकों की लंबी लाइन लिये यत्र-तत्र-सर्वत्र घूमते दिखाई दे जायेंगे। भला इसमें बुराई भी क्या है? क्राइम रिपोर्टरी का, क,ख,ग नहीं आता तो क्या हुआ? थाने-चौकी की जानकारी नहीं है तो क्या हुआ?  एसएसपी, एएसपी, डीसीपी, एडिश्नल डीसीपी में फर्क नहीं मालूम तो क्या हुआ? क्या इसके बिना क्राइम रिपोर्टरों के 'गुरु' नहीं बन सकते?
आखिर हमने (तथाकथित क्राइम रिपोर्टर-गुरु) कई साल तक डेस्क पर क्राइम-रिपोर्टरों की कॉपी चेक (संपादित) की है। उनकी खबरों पर शीर्षक (हैडिंग) लगाये हैं। अखबार के पन्नों पर आधी रात को प्रेस में क्राइम की सैकड़ों खबरें पेस्ट (चिपकवाईं) कराई हैं। फलां-फलां न्यूज-चैनल में थे, तो कई रिपोर्टरों द्वारा एसाइनमेंट डेस्क पर मुहैया कराई गयी फीड (वीजुअल) और डिटेल्स लेकर एंकर वीओ-शॉट्स वीटी एडिटर से चिपकवाकर ऑन-एअर (प्रसारित) करवाये हैं। भला और क्या योग्यता चाहिए क्राइम रिपोर्टरों का गुरु बनने के लिए?
बुजुर्गों ने कहा है- बात गाय की भी कहो, और कसाई की भी।
 भूसे में लाठी भांजने से कुछ नहीं होता। मैं भी कैसा इंसान हूं। सब कमियां क्राइम-रिपोर्टरी के गुरुओं में ही गिनाने-बताने बैठ गया। सब कमी कोई गुरु-जी में ही थोड़ा न है। क्राइम रिपोर्टिंग की 'नर्सरी' में कैंसर के जीवाणुओं का छिड़काव करने का ठीकरा अकेले 'सर-जी'  के ही सिर क्यों फूटे?  ये तो सरासर अन्याय हो जायेगा। सर-जी ने जब खुद क्राइम-रिपोर्टरी की ही नहीं, तो भला वे उसके प्रति अपना उत्तरदायित्व भी कैसे समझ सकेंगे? कैसे समझेंगे कि कितनी जिम्मेदारीपूर्ण होनी चाहिए क्राइम-रिपोर्टरी? कितना जोखिम है क्राइम-रिपोर्टरी में?  कितनी मेहनत है क्राइम-रिपोर्टरी में? कितने दम-दिमाग का काम है क्राइम-रिपोर्टरी? कितने सब्र की जरुरत होती है क्राइम-रिपोर्टिंग में? कितने विशाल नेटवर्क की जरूरत होती है क्राइम-रिपोर्टिंग के लिए? कैसे दिन और रात के बीच फर्क करना याद नहीं रहता क्राइम-रिपोर्टर को?  कैसे आंधी, तूफान, तपिश या हाड़-तोड़ जाड़े से जूझना पड़ता है क्राइम-रिपोर्टरी में?  कैसे खोजने पड़ते हैं अपराध की खबरों में से मानवीय संवेदनाओं वाले तथ्य? कितना बुरा महसूस करवाता है जाड़े की ठिठुरती ठंड में आधी रात को नींद से बोझिल आंखें लिए क़त्ल की कवरेज (रिपोर्टिंग) पर गरम रजाई छोड़कर जाने का मोह। दफ्तरों के एसी की ठंडी हवा से निकलकर मई-जून की तपती गर्मी में अपराध की खबर के संकलन पर निकलना। आदि-आदि।
इस सबके बाद भी क्राइम रिपोर्टर बनने के इच्छुक बच्चा-लोग और क्राइम-रिपोर्टर के गुरुओं की लंबी चौड़ी जमात मौजूद है। वो जमात जिस पर किसी का वश नहीं चलता। उन न-समझों की भीड़, जिन्होंने अभी पत्रकारिता की दुनिया में ठीक तरह से आंख भी नहीं खोली है, लेकिन 'डायरेक्ट क्राइम-रिपोर्टर' बनने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़े हैं। क्राइम-रिपोर्टरी के कारोबार में एकदम 'बिचारे' गुरु-जी के। अब बताओ ऐसे में भला गुरु-जी का क्या दोष?

वे तो किसी को घर से बुलाने जा नहीं रहे हैं। आओ। सबको एक ही दिन में क्राइम-रिपोर्टर बना डालूंगा। लोग (नई पीढ़ी) खुद ही आ रहे हैं। और 'आ बैल मुझे मार' वाली कहावत खुद ही, खुद पर चरितार्थ करवाने पर उतारु हैं। अब बताओ भला, भलमानस गुरु-जी भी क्या करें?  अगर सर-जी किसी को क्राइम रिपोर्टर न बना पायें, या न बनवा पायें, तो भला इसमें बताओ सर-जी का क्या दोष?  ये गलती तो सरासर 'शिष्य' की है। वो 'सर' के क्राइम-रिपोर्टरी के जमीनी, नैतिक, सामाजिक और शैक्षिक-ज्ञान को ही नहीं नाप-तोल पा रहा है। किसी मीडिया इंस्टीट्यूट में दाखिला लिया नहीं, कि क्राइम-रिपोर्टर बनने का जुनून सवार। जुनून भी इस हद तक कि दिमाग को करीब-करीब 'सुन्न' कर दे। उसी तरह जैसे कॉमनवेल्थ-गेम्स खतम होने के बाद खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का दिमाग बर्फ में लगा हुआ समझा, माना और कहा जा रहा है। सही-गलत के बीच फर्क करने, सोचने और समझने की ताकत लगभग खत्म हो जाती है।

मुझे न तो क्राइम-रिपोर्टरी से कोई जलन है। न क्राइम-रिपोर्टर से। जलन होगी भी भला क्यों?  मैं खुद भी तो अदना सा क्राइम-रिपोर्टर था, हूं और रहूंगा। ये अलग बात है, कि जिंदगी भर क्राइम की कोई बड़ी 'ब्रेकिंग'  या 'एक्सक्लूसिव' खबर नहीं कर सका। क्राइम रिपोर्टिंग के कुछ उन तथा-कथित मठाधीशों की नज़र में, जो मुझसे ही एक-एक शब्द मांगकर क्राइम-रिपोर्टिंग की दुनिया में 'साहिब-ए-किताब' हुए बैठे हैं। जिन्हें मैंने ही तमाम सनसनीखेज खोजी खबरें लाकर दीं। वे मेरी इन्हीं खबरों पर अपने चेहरे पोतकर (मेकअप) आधे घंटे की एंकरिंग करके टीवी जर्नलिज्म के शो-मैन यानी राजकपूर बन गये। पत्रकारिता की तमाम जिंदगी उन्होंने खुद को झूठी दिलासा देकर बिता दी। इस गुमान के साथ कि देश में उनसे धुरंधर खोजी और क्राइम-रिपोर्टरी का पितामाह न कोई था,  न है और न आइंदा होगा। इन्हीं में कुछ ऐसे वरिष्ठ क्राइम-रिपोर्टर भी हैं, जो अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम की क्रिकेट मैच देखते हुए की एक 'जुगाड़ू'  फाइल फुटेज के दम-खम पर कई साल से एसआईटी (स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम) प्रमुख पद पर अपनी कुर्सी की 'खैर' मनाने की अगरबत्ती जला रहे हैं। या फिर इंटरनेट से फुटेज का 'जुगाड़' करके क्राइम-रिपोर्टिंग की दुनिया में अपना नाम रोशन करने की लड़ाई दिन-रात लड़ रहे हैं।
कम हम भी नहीं हैं। क्राइम-रिपोर्टिंग दुनिया के ऐसे 'धुरंधरों'
की काट के लिए हमने, इन्हीं से इनका 'मूल-मंत्र' चुरा लिया। करो कम, गाओ-बजाओ ज्यादा। मैंने ये खबर फोड़ी, मैंने वो खबर फोड़ी (भारत में टीवी रिपोर्टिंग की दुनिया से 'फोड़ी' शब्द की उत्पत्ति हुई है, फोड़ी यानी ब्रेक की), जैसे जुमले सुना-सुनाकर अपने उस्तादों और दफ्तर में सीनियर-जूनियरों के कानों में कम-सुनने की बीमारी पैदा कर दी।
उफ्। बात थी क्राइम रिपोर्टिंग की क्लास में फैलते कैंसर की। और मैं कैंसर का इलाज करने में फंस गया?  अरे भाई जब बीमारी पैदा हुई है, तो असर भी दिखायेगी ही। जब गली-गली में पत्रकारिता की पढ़ाई की दुकानें खुल गयी हैं, खुल रही हैं। तो वे सब ताला-बंदी के इरादे से तो खोली नहीं गयीं न। सब खाने कमाने के इरादे से ही तो खुली हैं। कुछ-एक को छोड़कर। मां-बाप की गाढ़ी-कमाई और संतान को पत्रकार बनाने के उनके अरमान, कोई कॉमनवेल्थ गेम्स का सरकारी बजट तो है नहीं, जो सुरेश कलमाड़ी की तरह यूं ही फिजूल में दिल्ली की चौड़ी सड़कों पर पानी की मानिंद बहाकर छोड़ दिया जाये। ऐसे ही तो पैसा नहीं फूंक रहे हैं न माता-पिता। पुत्र-पुत्री को पत्रकार बनाने की तमन्ना संजोये।

पत्रकार बनने के दु:ख ही तो नहीं पता बिचारे मां-बाप को। क्राइम रिपोर्टिंग या फिर रिपोर्टिंग का सुख तो वे भी घर में टीवी के सामने बैठकर देख और महसूस कर लेते हैं। कैसे दिन भर रिपोर्टर देश-विदेश में कैमरे पर खड़े होकर ज्ञान वांचते हैं। यहां बम फटा, वहां सूनामी आया, कहीं हवाई-जहाज गिरा, तो कहीं धरती धंसी या फटी। जिधर, जहां देखो। हर जगह रिपोर्टर या क्राइम-रिपोर्टर मौजूद। कितना सुखद अनुभव होता होगा, टीवी पर किसी क्राइम-रिपोर्टर को बोलते सुनते-देखकर? उन मां-बाप को, जो अपनी संतान को पत्रकारिता का छात्र बनाये बैठे हैं। या पत्रकार बनाने की तमन्ना संजोये बैठे हैं। वे नादान हैं। नहीं जानते आज रिपोर्टरी या क्राइम-रिपोर्टरी का सच। वे नहीं पढ़ सकते हैं क्राइम रिपोर्टरी के मठाधीशों का मन। जो मैदान में किसी नये खिलाड़ी के आने से हो उठते हैं, बेचैन। जो नहीं जानते खुद क्राइम रिपोर्टिंग के मायने, उसका दर्द और उसके पीछे छिपी मेहनत और जोखिम का रुह कंपा देने वाला सच। क्योंकि आज उनसे बढ़कर कोई दूसरा क्राइम-रिपोर्टर नही है न।



बीमारी से घबराने की जरूरत नहीं है। जरुरत है बीमारी के सही इलाज की। क्राइम रिपोर्टर बनने और बनाने से पहले जरुरत है, रिपोर्टरी का क, ख, ग सीखने की। किसी ऐसे अखबार या न्यूज चैनल में काम करके, जहां अभी कुछ पत्रकारिता बची हो। फिर भी जिस तरह रिपोर्टर और क्राइम-रिपोर्टर बनने और बनाने वाले शौकीनों की आज देश में बाढ़ आयी है, या जिस रफ्तार से इनकी संख्या बढ़ रही है। उसे देखकर तो बॉलीवुड के शो-मैन स्व. राजकपूर के शब्द एक बार जेहन में जरुर कौंध जाते हैं- 'वो शौक भी क्या जो इंसान को पागल न बना दे।'

Saturday, 18 June 2011

तबाही वहां, "ब्रेकिंग" का टोटा यहां

                   उनकी बर्बादी,  हमारी "खबर"
जापान में जलजले और सूनामी से तबाही मच गयी। क्या इंसान-इमारत और क्या जहाज-हवाई जहाज। सब एक संग उड़, जल और बह गये। सबका अस्तित्व एक साथ समाप्त हो गया। क्या लोहा और क्या इंसान। जलजले और सूनामी की मार ने सबकी बेबसी कर दी एक सी। जापान ने जिन परमाणु संयंत्रों को खुद की हिफाजत और दुश्मन की तबाही के लिए जमीन के भीतर (गुप्त स्थानों) सहेज कर रखा था, सूनामी और जलजले के लंबे हाथ और तेज नज़रें वहां भी जा पहुंची।
बिना किसी से पता पूछे। कहने का मतबल ये कि जमीन में छिपाकर रखे गये परमाणु संयंत्र आग की चपेट में आकर रेडियेशन फैलाने लगे। और अपनों के लिए ही 'काल का गाल' बन गये।
 ये कहकर मुसीबत की इस घड़ी में मैं जापानियों की हंसी या मखौल नहीं उड़ा रहा। सबकी तरह मैं भी दु:ख की इस घड़ी में जापान और वहां की जनता के ही साथ हूं। मुझ पर, हम पर या फिर किसी पर भी और कहीं भी-कभी भी ऐसी मुसीबत पड़ सकती है। ये तो थी, कम शब्दों में अत्याधुनिक तकनीक हासिल करने वाले देश जापान की एक बार फिर विनाश की तबाही की कहानी। जिसे देखकर दुनिया थर्रा उठी है। वो कहानी, जिसे लिखा प्रकृति ने। भोगेगा जापान और वहां की जनता। सुनेंगी और पढ़ेंगी आने वाली पीढ़ियां। जैसे आज हम किताबों में पढ़ते हैं, नगासाकी और हिरोशिमा पर परमाणु बम की तबाही का इतिहास।

जापान में आज के जलजले-सूनामी और बीते कल की जापान की तबाही में फर्क है तो इतना, कि उस वक्त सिर्फ इंसान और जानवरों की जिंदगियां गयी थीं। अब इंसान के साथ-साथ आने वाले कल की पीढ़ियों के लिए सहजकर रखी गयी धरोहरें भी खत्म हो गयीं।
छोड़िये भी। सूनामी और जलजला जापान में। तबाही जापान की। मैं बे-वजह ही माथा-पच्ची करके आपका और अपना वक्त जाया करने लगा। हमारे यहां हसन अली, पीजी थॉमस, 2-जी स्पेक्ट्रम, बोफोर्स, भोपाल गैस-कांड..  गोधरा। ये सब जापान के जलजले और सूनामी से क्या कम हैं? जापान में एक जलजला और सूनामी। हमारे यहां जिधर नज़र उठाओ, उधर ही जलजला और सूनामी।
  जापान के जलजले और हमारे यहां के जलजले में बस थोड़ा ही तो फर्क है। जापान के जलजले ने तुरंत असर दिखाकर दुनिया की रुह कंपा दी। हमारे यहां के जलजले धीरे-धीरे 'जलवा'  दिखाकर हमारी आने वाली पीढ़ियों की जड़ें खोद रहे हैं।
  जापान की सूनामी और जलजले से मुझे उम्मीद बंधी थी। उम्मीद ही नहीं बंधी, बल्कि यकीन था खुद पर, कि इस बार छोटे भारतीय समाचार डिब्बे यानी 'न्यूज-चैनल'  जापान की तबाही से कुछ न कुछ जलजले का जलवा जरूर 'कैश' (टीआरपी के रुप में) करेंगे। मसलन- ब्रेकिंग न्यूज के मामले में या फिर दिन भर एक्सक्लूसिव खबर को बार-बार दिखा और रगड़कर। दिल को बड़ी ठेस पहुंची। ऐसा कुछ नज़र नहीं आया। या यूं कहूं अपनी सोच पर और खुद पर कोफ्त हुआ। छठी इंद्री खुली तो समझ आया, जरुरी तो नहीं कि सब न्यूचैनल मेरी मर्जी के मुताबिक ही चलें। अपना पैसा, अपना चैनल, अपना धंधा।
जापान के जलजले को नहीं कर पाये कैश। नहीं लगा पाये दिन-रात ब्रेकिंग का रट्टा। नहीं जुटा पाये हर बुलेटिन में जापान के जलजले पर एक्सक्लूसिव। बताओ मैं क्या कर लूंगा? किसी न्यूज चैनल का। फालतू में किसी के फटे में टांग फंसाने पर तुला बैठा हूं। जापान के जलजले में अगर बह गयी भारत की ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव की उम्मीद, तो उससे भला मुझे क्यों तकलीफ होने लगी? दूसरे- अपने दिल को समझाने का मैंने खुद ही रास्ता भी खोज लिया। ये सोचकर कि जब जापान के जलजले पर अपना (भारतीय न्यूज चैनल) कुछ था ही नहीं, तो बताओ भला हमारे छोटे समाचार डिब्बे एक्सक्लूसिव और ब्रेकिंग प्लांट भी क्या करते और आखिर कब तक और कैसे? बात भी सही है। दूसरे देश की तबाही। उनका दर्द, उनकी संवेदनायें। शायद इसीलिए हमारे ब्रेकिंग के धुरंधरों ने बैकफुट पर आने में ही अपनी भलमनसाहत समझी। इस तर्क के साथ, कि भारतीय न्यूज चैनलों ने जितना दिखा दिया, जापान की जनता और वहां की सरकार उसे ही खुद पर हमारा (भारतीय न्यूज चैनल) अहसान समझें। जापानी ये न समझे कि हमारे पास जापान के जलजले और सूनामी की ब्रेकिंग या एक्सक्लूसिव खबरों का अकाल पड़ गया या फिर ब्रेकिंग खबरें हमें नसीब ही नहीं हुईं (खुद का मन समझाने के लिए)।
क्या ये कोई कम बड़ी बात है या क्या ये जापान पर हमारे टीवी चैनलों का कोई कम अहसान है, कि जापानी चैनलों का फुटेज भारतीय न्यूज चैनलों ने जितना हो सकता था,  उतना दिखाया। यानी तेरा तुझको अर्पण। ये अलग बात है, कि ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव की कमी और उसका जुगाड़ करने की भागमभाग में किसी भी जापानी चैनल के फुटेज पर 'सौजन्य'  (उस चैनल का नाम जिससे फुटेज का जुगाड़ किया) नहीं दर्शा सके। या यूं कहें कि नहीं दर्शाया। शायद ये सोचकर सौजन्य नहीं लिखा होगा, कि हम जापान पर उनकी त्रासदी की खबर दिखाकर 'अहसान'  कर रहे हैं।
 और फिर ऐसे में कौन सा कोई जापानी चैनल 'कॉपी-राइट'  के तहत हम पर मुकदमा ठोकने भारत आ रहा है। अपनी त्रासदी से जापान पहले निपटेगा, कि हम पर बिना सौजन्य के फुटेज इस्तेमाल करने की मुकदमेबाजी में वक्त बर्बाद करेगा। वो जापान जहां इंसान, विज्ञान और तकनीक सब कुछ एक साथ या तो आग में स्वाहा हो चुके हैं, या फिर तूफान और पानी में उड़-बहकर जमींदोज हो चुके हो।
त्रिपोली-मिस्र में जनता सड़कों पर उतर आयी। कुछ देशों के न्यूज चैनल दोनों जगह पहुंच गये। ऐसे में हम पीछे कैसे रह पाते। मसला यहां भी ब्रेकिंग, टीआरपी और एक्सक्लूसिव का ही था। लिहाजा जिस समाचार चैनल की जैसी हैसियत खर्च करने की थी, हमारे देश के उस न्यूज चैनल ने अपने कुछ उन 'खास-वरिष्ठों'  को त्रिपोली, मिस्र में कवरेज के लिए रवाना कर दिया।
 चैनल के खर्चे-खाने पर, जो लंबे समय से देश के किसी गांव में भूख और कर्ज से मरने वाले किसी किसान या गरीब की मौत पर 'लाइव-कवरेज'  के लिए मई-जून की तपती धूप या फिर दिसंबर-जनवरी की हाड़तोड़ (शीतलहर) ठंड में लंबे समय से नहीं गये होंगे। शायद इसलिए, क्योंकि ऐसी खबरें इन वरिष्ठों की नजर में 'छोटी'  और टीआरपी-लैस हैं। या यूं कहें कि ऐसी घटनाओं की लाइव-कवरेज से उनकी तौहीन होती है। त्रिपोली और मिस्र की कवरेज से तो आगे की नौकरी का 'रिज्यूम'  (बायोडाटा) ही बदल जायेगा। भले ही त्रिपोली और मिस्र में उन्हें वहां की सेना ने सीमा-रेखा पर ही रोक लिया हो, या होटल के किसी कमरे में बंद कर दिया हो। भला ये कहने वाला मैं कौन होता हूं?  त्रिपोली और मिस्र गये भारतीय समाचार चैनलों के ज्यादातर वरिष्ठ खबरनवीस खुद ही अपने-अपने चैनलों पर चीख और चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे थे।
फिर वही जापान के सूनामी और जलजला की बात। वहां की बर्बादी का 'लाइव'  (सीधा प्रसारण) करने के लिए किसी भी भारतीय न्यूज चैनल ने रुख नहीं किया। अब ये कहना तो ठीक नहीं होगा, कि जापान में तबाही के मंजर की तस्वीर को लाइव दिखाने में मशक्कत ही नहीं, जिंदगी और मौत का भी सवाल था। ऐसे में भला उधर का रुख कौन, क्यों और कैसे करता? छोड़ो भी एक ब्रेकिंग नहीं जायेगी, तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा? जिंदगी से बढ़कर भी भला कोई नियामत हो सकती है? जान है तो जहान है। और फिर अभी-अभी तो लौटे हैं त्रिपोली और मिस्र की सीमा-रेखा से लाइव-कवरेज करके। उसकी थकान भी तो नहीं उतरी है अभी तक।

वैसे भी हर बात को नकारात्मक रुप में ही नहीं देखना-सोचना चाहिए। जापान की सी त्रासदियां, जलजला-सूनामी जैसी प्राकृतिक आपदायें तो फिर भी दुनिया में होती-आती-जाती रहेंगी। फिर कभी उनका लाइव-कवरेज करके दे देंगे- ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव। कोई वेद-पुराण, ग्रंथों में तो लिखा नहीं है, कि लाइव कवरेज और ब्रेकिंग या एक्सक्लूसिव की खातिर जापान के जलजले में ही जान देने से ही टीवी पत्रकार के धर्म की रक्षा होगी।