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Monday, 13 June 2011

अपने 20 साल के पत्रकारीय करियर में ऐसा कभी न देखा, न सुना




          बुश को जूता, बापू को अंगूठी : द लास्ट सैल्यूट ! 
तारीख 15 मई 2011 । दिन रविवार। समय शाम करीब पौने पांच बजे। जगह दिल्ली में राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधी । समाधि के चारों ओर चिलचिलाती धूप ।  पसीने से तर-ब-तर जबरदस्त भीड़। क्या बच्चे, क्या बूढ़े-जवान । सबको पड़ी है, करीब से बापू की समाधि के दर्शन करने की।

समाधि के इर्द-गिर्द शोर के नाम पर गिलहरियों की चीं-चीं और कौवों की कांव-कांव। कभी-कभार बीच-बीच में समाधि के चारों ओर मौजूद हरी घास पर अनजाने में घुस आये बच्चों को हटाने के लिए गार्ड द्वारा बजाई गयी सीटी की आवाज ध्यान को भंग करती है। भीड़ में इक्का-दुक्का फोटोग्राफर हैं, जो लोगों को बुला-बुलाकर ग्रुप में बापू की समाधि के बैक-ग्राउंड में यादगार फोटो खिंचवाने को प्रेरित कर रहे हैं।  दो जून की रोटी के जुगाड़ में।

अचानक समाधि के आसपास आवाजें आने लगीं।  महेश जी नमस्कार। भट्ट जी नमस्ते। कैसे हैं भट्ट सर आप। पूजा जी भी आई हैं क्या आपके साथ। क्या शूटिंग करेंगे राजघाट पर। आपकी फिल्में बहुत बढ़िया लगती हैं। हमें तो विश्वास ही नहीं हो रहा, कि हम आपके और आप हमारे इतने करीब मौजूद हैं। हर कोई महेश जी को छू-कर देखने को आतुर। बच्चे नहीं जानते कि ये शख्स कौन हैं ? फिर भी मम्मी-पापा, दादा-दादी की रौ में महेश की जींस-कमीज, हाथ-पांव खींचने में जुट गये हैं। शायद ये सोचकर की जब मम्मी-पापा महेश जी से मिलने को इतने आतुर हैं, तो महेश जी जरुर कुछ खाने-पीने की चीज होंगे। 

सबकी नज़रें महेश की तरफ ही उठ जाती हैं।...बापू की समाधि से हटकर। भीड़ घेर लेती है समाधि पर पहुंचने से पहले ही महेश जी को। पूरी बाहों वाली (आस्तीन आधी ऊपर को पलटी हुई)  काले रंग की शर्ट, नीली जींस और पैरों में हवाई चप्पल पहने ये महेश जी थे- "महेश भट्ट"। फिल्म मेकर। या कहिये पूजा भट्टा के पिता महेश भट्ट। या इनकी देश में एक नई पहचान राहुल भट्ट के पिता के रुप में भी बन गयी है। वही राहुल भट्ट, जिस पर मुंबई हमले का ब्लू-प्रिंट बनाने वाले हेडली को भाड़े की रिहाईश दिलवाने के आरोप लगे। देश भर में बबाल मचा था। ये महेश भट्ट उसी राहुल भट्ट के पिता भी हैं।

महेश भट्ट बापू की समाधि पर क्या पहुंचे ? अपने साथ चीख-पुकार भी लेकर आये। महेश भट्ट के समाधि परिसर में पांव पड़ते ही, थोडी देर पहले घास पर मूंगफली चब रहीं गिलहरियां गायब हो गयीं। महेश भट्ट के आने के बाद मची भागम-भाग में समाधि के आस-पास घास की रखवाली कर रहे सुरक्षा गार्ड सीटी बजाना भूल गया। भट्ट के साथ तीन चार लोग और थे। इनमें से दो के चेहरे, कद काठी मेरे दिल-ओ-दिमाग में उतर गये। एक गबरु जवान था। जिसकी उम्र रही होगी करीब 35-40 साल। गोरा-चिट्टा रंग। ठोढ़ी पर छोटी सी स्याह काली दाढ़ी। बदन पर काला हल्का कोट। पैरों में काले जूते। मजबूत कद-काठी।  और दूसरी शख्शियत थीं, एक गोरी मेम। यानि अंग्रेज महिला। उनका नाम न मैंने पूछा। न किसी ने बताया । मेम की उम्र का अंदाज हमने खुद लगा लिया। रही होंगी यही कोई 55 से 60 साल के बीच।

महेश भट्ट के साथ उस गबरु नौजवान और उन गोरी मेम ने भी गांधी को नत-मस्तक होकर श्रद्धाभाव जाहिर किया। कुछ देर वे सब बापू के सम्मान में सिर झुकाये खड़े रहे। आसपास की बाकी भीड़ से बे-खबर। सबसे पहले महेश भट्ट, उसके बाद गोरी मेम और फिर एक-एक कर,  बाकी सब लोगों ने भी अपने चेहरे ऊपर उठाकर आंखें खोल दीं। और समाधि की ओर हाथ जोड़कर खड़े हो गये। शायद ये सोचने के लिए कि- "दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ।" लेकिन मेरी नज़र अब भी उस गबरु जवान पर ही गड़ी थी। जिसने अब भी बापू चरणों में झुके अपने सिर को ऊपर उठाकर नहीं देखा था।



 अपने काफिले के बाकी लोगों की तरह । धीरे-धीरे उस नौजवान ने आंखे बंद किये-किये ही सिर को ऊपर उठाया। समाधि की ओर जोड़कर रखे गये हाथों को खोला। और अपने हाथ की एक उंगली में मौजूद अंगूठी को निकालकर बापू की समाधि पर ही उनके चरणों पर चढ़ा दिया। बिना आंखे खोले। बिना इधर उधर किसी को देखे-भाले। जो कुछ मैं देख रहा था, वो था तो सच। लेकिन खुद पर और अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। क्योंकि 40 साल की अपनी कुल उम्र और 20 साल के अपने पत्रकारिता के कार्यकाल में मैंने ऐसा कभी न देखा, न सुना था, कि श्रद्धाभाव के वशीभूत किसी ने बापू के चरणों में उनकी समाधि पर अपने हाथ में पहनी हुई अंगूठी समर्पित कर दी हो।

मेरी याद में बापू के चरणों में फूल समर्पित करने से आगे कोई बढ़ा हो अब तक। चाहे वो हम-वतन का कोई नेता रहा हो या फिर अमेरिका जैसी सुपर-पॉवर का कोई राष्ट्रपति।  बार-बार जेहन में सवाल कौंधने लगा, कि महेश भट्ट के साथ भीड़ में शामिल ये गबरु नौ-जवान कुछ खास तो है। जो देखने-भालने भर का ही मुझे अपनी और आपकी तरह नज़र आ रहा है, लेकिन दिल-ओ-दिमाग से हम और आपसे काफी कुछ हटकर है। उस नौजवान के बारे में जानने के लिए मेरे जेहन में पैदा हुए तमाम सवाल भीड़ और महेश भट्ट के ग्लैमर में ही दब-कुचलकर रह गये।

कोई नहीं जान-समझ पाया बापू के चरणों में अंगूठी चढ़ाने वाले उस गबरु जवान के बारे में। न मैं और न राजघाट पर बापू की समाधि के दर्शन करने पहुंची भीड़ में से कोई। मगर जरुरी था उस युवक के बारे में जानना। हमारा और आपका। जिसकी भाषा थी अरबी और देखने में था हम-सबसे (हिंदुस्तानियों) जुदा-जुदा।

देखते-करते शाम के करीब साढ़े छह बज गये।  सूरज ढलने लगा। सूरज ढलने के साथ ही राजघाट पर भीड़ बढ़ने लगी । भीड़ बढती देख महेश भट्ट का काफिला राजघाट से बाहर निकल गया ।  भट्ट साहब का काफिला आईटीओ होता हुआ मंडी हाउस पहुंचकर श्रीराम सेंटर के सामने रुक गया। कारों से सब लोग उतरकर श्रीराम सेंटर के भीतर जा पहुंचे। पीछे-पीछे मैं भी श्रीराम सेंटर जा पहुंचा। उस नौ-जवान के बारे में जानने की जिज्ञासा पाले, जिसने बापू की समाधि पर उतारकर चढ़ा दी थी, अपनी उंगली में मौजूद अंगूठी ।

श्रीराम सेंटर में प्रवेश करते ही चारों तरफ देखने को मिले होर्डिंग, बैनर। सुर्ख लाल रंग के। जिन पर सफेद और काले रंग से लिखा था- "द लास्ट सैल्यूट" (THE LAST SALUTE) । और द लास्ट सैल्यूट के नीचे एक कोने में बना था जूता ।  टिकट खिड़की पर पूछा तो पता चला कि श्रीराम सेंटर के सभागार में द लास्ट सैल्यूट नाटक का मंचन होना है। सात बजे से। नाटक की स्क्रिप्ट (पटकथा) लिखी है राजेश कुमार ने और निर्देशन किया है- अरविन्द गौड़ ने।

नाटक शुरू हुआ । मंच पर सबसे पहले अवतरित हुए फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट। महेश भट्ट ने पढ़ना शुरु किया।  खुद का लिखा वो ख़त जो उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को संबोधित करते हुए लिखा था- कि वे (महेश भट्ट) बुश साहब के मेहमान बनने को तैयार नहीं हैं। इसके बाद शुरु हो गया नाटक- द लास्ट सैल्यूट। यानि आखिरी सलाम। नाटक करीब डेढ़ घंटे चला। पूरा नाटक मैंने भी देखा।

नाटक उस घटना पर आधारित था, जिसमें इराक में प्रेस-कांफ्रेंस के दौरान एक इराकी पत्रकार ने उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के मुंह पर अपने जूते फेंक कर दे मारे थे। नाटक खत्म होने पर परदा गिरा। लाइटें बंद हुईं। चंद लम्हे बाद मंच पर जब दुबारा रोशनी हुई तो खड़े नज़र आये महेश भट्ट और वही गोरा-चिट्टा गबरु नौजवान, जिसने राजघाट पर बापू की समाधि पर चढ़ा दी थी, हाथ की उंगली से उतार अंगूठी।

जेहन में फिर सवाल कौंध गये । अरे आखिर कौन है, ये नौजवान ? जिसने चढ़ा दी थी गांधी की समाधि पर अंगूठी !  जिसे न बोलनी आती अंग्रेजी और न बोल पाता है हिंदी । जो अरबी भाषा के अलावा दुनिया की कोई और भाषा न बोल सकता है, न समझ सकता है ।  दर्शकों की भीड़ में बैठा मैं उस युवक के बारे में किसी से कुछ पूछूं,  उससे पहले ही नाटक के निर्देशक अरविंद गौड़ मंच पर आ जाते हैं। और बोलना शुरु कर देते हैं - दोस्तो आईये अब आपको मिलवाते हैं, उस शख्शियत से।  जिस पर, और जिसके कारण लिखा गया है नाटक -  द लास्ट सैल्यूट ।

अभी आप लोगों द्वारा देखे गये नाटक में मुख्य किरदार यानि बुश पर जूता फेंकने वाले इराकी पत्रकार का रोल निभाया था-  इमरान खान ने। इमरान खान यानि महेश भट्ट की आने वाली फिल्म चंदू के नायक । और आईये महेश भट्ट जी के साथ जो शख्शियत खड़ी है, वो ही है द लास्ट सैल्यूट का असली किरदार....यानि इराकी पत्रकार मुंतजर अल ज़ैदी।

मुंतजर अल ज़ैदी। कानों में आवाज सुनाई दी। तो चंद लम्हों को तो सोचने-समझने की ताकत ही जाती रही। विश्वास नहीं हुआ, कि जिस शख्स ने बापू की समाधि पर उनके चरणों में श्रद्धाभाव के चलते मेरी आंखों के सामने अपनी अंगूठी चढ़ा दी।  वो गबरु नौजवान कोई और नहीं। जार्ज बुश पर जूता फेंकने वाला इराकी पत्रकार मुंतजर अल ज़ैदी थे। यानि जार्ज बुश को जूता और बापू को अंगूठी। द लास्ट सैल्यूट, देखने के बाद सामने आयी उस शख्स की हकीकत, जिसके पीछे मैं भरी दोपहरी दिन-भर यहां वहां की खाक छानता फिरता रहा। और समझा कि -  द लास्ट सैल्यूट, का असली हीरो खुद ही मेरे पास वाली कुर्सी पर बैठकर देख रहा था- खुद पर तैयार नाटक....द लास्ट सैल्यूट, का मंचन ।

चलते-चलते हमने मुंतजर अल ज़ैदी से अंगूठी का राज जानना चाहा, तो उन्होंने साथ मौजूद अपने ट्रांसलेटर (दुभाषिये) और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्धालय के अरबी साहित्य के रिसर्च स्कॉलर मोहम्मद ईसा के जरिये बताया- ये वो अंगूठी है, जो उनके धर्म से जुड़ी है। ये अंगूठी, जॉर्ज बुश पर जूता फेंकने की घटना से पहले उन्होंने अपने दोस्त के हवाले कर दी थी। इस गुजारिश के साथ कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति पर जूता फेंकने के आरोप में वो मारा जाये, तो अंगूठी निशानी के तौर पर उसके घर वालों के हवाले कर दे। तो ये अंगूठी थी राजघाट पर बापू के चरणों में अर्पित,  मुंतजर अल ज़ैदी का महात्मा गांधी को --- "द लास्ट सैल्यूट।"

इराक में अत्याचार और भारत में लोकतंत्र है : मुंतज़र



संजीव- एक पत्रकार ने तो भारत के गृहमंत्री पर ही जूता फेंक दिया । यानि आपके द्वारा दिया गया जूता-कल्चर दुनिया फालो कर रही है?
ज़ैदी- हर किसी पर जूता फेकेंगे, तो जूते की मार की चोट कम हो जायेगी। जब तक आप पर, आपके देश और आपके समाज पर कोई बम-गोली न बरसाये, तब तक जूता न उठायें। जो जूते के लायक है, उसे जूता दें और जो गुलदस्ते के काबिल है, उसका इस्तकबाल गुलदस्ते से करें।
संजीव-  आपने बुश पर जूता फेंका ।इसके बाद बगदादिया चैनल का आपके प्रति क्या रवैया था ?
ज़ैदी- सब खुश थे । जब तक मैं जेल में रहा उतने समय (करीब नौ महीने) की मेरी तनख्वाह  घर भिजवाई गयी। चैनल की तरफ से मुझे रहने के लिए फ्लैट भी दिया गया ।
संजीव- दुनिया में जूता-कांड के बाद आप इराक के हीरो बन गये फिर भी आपको वीजा किसी अरब या यूरोपीय देश ने नहीं दिया, सिवाये भारत के?
ज़ैदी- सबका निजी मामला है। लेकिन भारत ने मुझे वीजा देकर साबित कर दिया, कि उसे किसी का डर नहीं है।
संजीव- कैसे मिला भारत का वीजा?
ज़ैदी- दिल्ली में रहने वाले इमरान जाहिद साहब मेरे दोस्त हैं। उन्होंने बात चलाई थी। मैं गांधी जी को करीब से छूना, देखना, उनसे बात करना चाहता था। मेरी साफ मंशा, इमरान भाई और महेश साहब (भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट) की कोशिशें कामयाब रहीं।
संजीव- हिंदुस्तान की सर-ज़मीं को छुए हुए दो दिन हो गये हैं, कल चले जायेंगे आप इराक ? यहां से हमवतन (इराक) क्या लेकर जा रहे हैं?
ज़ैदी- जिंदादिल भारत की मिट्टी की खुश्बू यहां के लोगों से मिला प्यार । भारत की सर-ज़मीं पर जीया हर लम्हा और  हिंदुस्तान की मेहमानवाजी अपने साथ लेकर जा रहा हूं।
संजीव- भारत में गांधी जी की समाधि ही देखने की तमन्ना क्यों थी ? कहने को दुनिया का अजूबा और प्यार का प्रतीक ताजमहल भी भारत में ही है।
ज़ैदी- इराक ने कुर्बानियां दी हैं। गांधी ने कुर्बानी दी। उन्होंने अत्याचारों के खिलाफ जिस चिंगारी से आग लगाई, वो देखिये (गांधी समाधि पर जल रही लौ की ओर इशारा करते हुए) आज भी जल रही है। क्या ताजमहल पर भी ऐसी ही लौ जलती है?
संजीव- द लास्ट सैल्यूट लिखने के पीछे क्या मंशा थी ?
ज़ैदी- "द लास्ट सैल्यूट"  एक बेगुनाह पर अत्याचारों का सच है।
संजीव- इराक और भारत में फर्क?
ज़ैदी- इराक में अमेरिका का अत्याचार है भारत में अपना लोकतंत्र। आप खुद अंदाजा लगा लीजिए, दोनो देशों में कौन पॉवरफुल है?



बे बम बरसाते हैं, तब भी कुछ नहीं होता


संजीव- गांधी जी का लिखा-पढ़ा कुछ याद है?
ज़ैदी- गांधी जी ने कहा था - मैंने हज़रत हुसैन की ज़िंदगी से सीखा है कि मैं मज़लूम (जिस पर ज़ुल्म और ज्यादती हुई हो) बनूं। ताकि मुझे जीत हासिल हो।
संजीव- आज गांधी जी आपके सामने आकर खड़े हो जायें, तो उनसे क्या कहेंगे?
ज़ैदी- कौन कहता है गांधी मर गये ? गांधी जी आज भी जिंदा हैं ज़िंदगी की तरह ।
संजीव- जूता फेंकने से पहले उसके परिणाम के बारे में सोचा था !
ज़ैदी- हां । मुझे पता था कि बुश पर पहला जूता फेंकते ही मुझे घेरकर मार दिया जायेगा।
संजीव- गांधी जी जूता-लाठी के खिलाफ थे । आपने तो बुश के मुंह पर जूते फेंके....
(सवाल के बीच में ही टोकते हुए.....)
ज़ैदी- महात्मा (गांधी) ने पीसफुल (शांतिपूर्ण) तरीके से रिव्योलूशन की बात की थी। बुश पर जूता फेंकना भी पीसफुलही था। उसमें कहां बम, गोली, तलवार, छुरे का इस्तेमाल किया मैंने?
संजीव- मुंतज़र, बराक ओबामा और जॉर्ज बुश को एक ही जेल में बंद कर दिया जाये, तो आपका रवैया क्या होगा?
ज़ैदी- ऐसा कभी नहीं हो सकता। हम (इराकी) हथियार उठाने भर से ही गुनहगार करार दिये जाते हैं । वे (अमेरिका) बम बरसाते हैं, तब भी कुछ नहीं होता।
संजीव- बुश पर जूता फेंकने से भी ज्यादा ज़िंदगी का कोई खास लम्हा?
ज़ैदी- महात्मा गांधी की समाधि का दीदार।
संजीव- क्या दुनिया में विरोध के लिए जूता परंपरा लाने और जेल जाने पर अफसोस है।
ज़ैदी- कोई और जूता न फेंके। आप किसी वाकये  को दोनो आंखों से देखें। जेल जाने का अफसोस बिलकुल नहीं है।
संजीव- दुनिया कह रही है मुंतज़र ने जूता कल्चर को जन्म दिया है । ऐसा नहीं करना चाहिए था।
ज़ैदी- अगर मैं, और मेरा जूता फेंकना गलत था, तो फिर इराक में बेकसूरों पर बम बरसाने वालों को क्या कहेंगे ?
                                                    जारी.....



ज़िंदगी की सबसे मुश्किल रात थी वो : मुंतज़र ज़ैदी

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर जूता फेंकने के बाद, बगदादिया न्यूज़-चैनल के पत्रकार मुंतज़र अल ज़ैदी पहली बार मई 2011 में भारत आये । नई दिल्ली पहुंचने पर मुंतज़र राजघाट स्थित महात्मा गांधी (बापू) की समाधि पर गये । ज़ैदी के साथ भारतीय फिल्म निर्माता / निर्देशक महेश भट्ट भी थे । ज़ैदी से हुई संजीव चौहान की विशेष-बातचीत.....
                     
संजीव- जॉर्ज बुश को जूता मारने की नौबत क्यों आई?
ज़ैदी- जिस चीज ने गांधी जी को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आंदोलन के लिए प्रेरित किया था, मेरा भी ऐसा ही उद्देश्य था। नाइंसाफी और ज़ुल्म के खिलाफ लड़ाई मेरा मकसद था।
संजीव- बुश पर जूता तैश में आकर फेंक दिया या भावनाओं में बहकर?
ज़ैदी- प्रेस-कांफ्रेंस की खबर मिलते ही, मैंने जूता मारने की प्लानिंग की थी। मैं दुनिया को बताना चाहता था कि यूएस (अमेरिका) ऑक्यूपेशन फोर्सेज का स्वागत फूलों से नहीं किया गया। उन्हें जूतों से सलामी दी।
संजीव- जूता मारने के बाद जब पकड़े गये,  उसके बाद जेल जाने तक क्या-क्या हुआ?
ज़ैदी- जब मुझे अरेस्ट किया गया, तो उन्होंने मेरे दांत तोड़ डाले। नाक तोड़ दी। दोनों पांव तोड़ दिये। इलेक्ट्रिक-शॉक दिये गये। कड़ाके की ठंड थी। फिर भी ठंडे पानी से टार्चर किया गया। पूरे बदन से खून टपक-बह रहा था। तीन महीने तक अंधेरी कोठरी में रखा गया।
संजीव- फिर....आप डर गये होंगे !
ज़ैदी- अगर दिल में डर होता, तो फिर जूता कैसे फेंक पाता? मेरे ऊपर प्रेशर बनाया गया, कि मैं जूता फेंकने के जुर्म में मांफी मांग लूं । मैंने माफी नहीं मांगी।
संजीव- जेल की पहली रात के बारे में कुछ बतायेंगे?
ज़ैदी- जिंदगी की सबसे मुश्किल रात थी वो।  पहली रात जेल में न ले जाकर, किसी सूनसान जगह पर ले गये थे। वहां प्राइम-मिनिस्टर के सिक्योरिटी गार्ड भी थे।  लेट नाइट तक वहां टार्चर किया गया। वे कहते जुर्म कबूल लो। बख्श देंगे। वरना ज़हन्नुम में भेज देंगे।
संजीव- पकड़े जाने वाली रात किसकी याद सबसे ज्यादा आई?
ज़ैदी- घर वालों की।
संजीव- गांधी कब और कैसे याद आये?
ज़ैदी- मैंने गांधी को उस वक्त पढ़ा था, जब मेरी उम्र सिर्फ सोलह-सत्रह साल रही होगी। मैं उनके (गांधी) आज़ादी के लिए किये गये संघर्ष के तरीके से प्रभावित था और हूं ।
संजीव- गांधी में क्या खास नज़र आया?
ज़ैदी- गांधी जी आजादी के नुमाइंदे और आइकॉन थे।

जारी.........भाग-दो

Saturday, 11 June 2011

“द लास्ट सैल्यूट” मुंतज़र की आपबीती है...महेश भट्ट

बॉलीवुड के  फिल्म निर्माता/ निर्देशक महेश भट्ट  से  संजीव चौहान की बातचीत....

                                       “द लास्ट सैल्यूट” मुंतज़र की आपबीती है...महेश भट्ट
                                                      


संजीव- मुंतज़र का ध्यान अचानक इतने साल बाद कैसे आ गया आपको ?
भट्ट- नीयत पाक-साफ हो । तो आप जो ठानते हैं आपको मिल जाता है। हमने जब मुंतज़र ज़ैदी के बारे में सुना तो गांधी जी की याद आ गयी ।
संजीव- मुंतज़र के ध्यान आने से गांधी की याद आने का क्या ताल्लुक ?
भट्ट- गांधी ने कैसे अंग्रेजों के खिलाफ सिर उठाकर एक रेवल्यूशन, एक एतिहासिक जंग लड़ी ? उसके बाद ये हमने आज़ादी पाई थी। तो कहीं पर हमें लगा कि ये तहजीब हमारे मुल्क की ही तहजीब है। तो हमने सोचा कि उन्हें (मुंतज़र अल ज़ौदी) यहां हिन्दुस्तान बुलाकर हमें अपनी ही तहजीब में जान डालनी चाहिए ।
संजीव- जॉर्ज बुश पर जूता फेंकने के बाद मुंतज़र को किसी भी देश ने वीजा नहीं दिया था। पहली मर्तबा किसने आपके कान में डाला कि मुंतज़र को हिन्दुस्तान बुलाया जाये और आप लेकर आये ।
भट्ट- हमारे मित्र हैं इमरान जाहिद साहब (महेश भट्ट की फिल्म चंदू के मुख्य किरदार और मुंतज़र अल ज़ैदी की किताब द लास्ट सैल्यूट पर आधारित नाटक में मुंतज़र ज़ैदी का किरदार निभाने वाले) ने  मुंतज़र ज़ैदी का जिक्र किया था मुझसे
संजीव- यानि महेश भट्ट नहीं, इमरान जाहिद लाना चाह रहे थे मुंतज़र को भारत !
भट्ट- नहीं ऐसा नहीं था । इमरान ने जब मुंतज़र का जिक्र मेरे सामने किया, उसी समय मेरे जेहन में अपने गांधी बाबा (महात्मा गांधी) आये। सोचा कि मुंतज़र अल ज़ैदी को भारत लाकर गांधी जी के ज़ज्बे को जिन्दा रखा जाये । हमने इस ज़ज्बे में नई उर्जा उड़ेली है।
संजीव- मुंतज़र और गांधी जी में कहीं कोई समानता दिखती है ?
भट्ट- सोच की सिमिलरिटी (समानता) है, लेकिन क्रांति का अंदाज़ दोनो का अलग-अलग है।
संजीव- खुलकर समझायें जरा । आपके कहने का मतलब क्या है ?
भट्ट- शायद गांधी की सोच में शत्रु का कोई कान्सेप्ट नहीं है।
संजीव- यानि मुंतज़र शत्रुता की सोच वाले हैं !
भट्ट- हां । मुंतज़र की सोच में अब भी शुत्र है । जिसके खिलाफ उन्होंने (मुंतज़र) आवाज उठाई थी । मगर वो (मुंतज़र) एक नौजवान शख्स है । धीरे-धीरे अपना दामन बचाकर एक नई दिशा में चलना शुरु कर देगा।
संजीव- द लास्ट सैल्यूट लिखवाने के  पीछे क्या वजह रही है ? कहते हैं महेश भट्ट ने ही लिखवाया है !
भट्ट- नहीं ये आपबीती है उनकी (मुंतज़र)। जो मुंतज़र के दिल से फूटी और हमने इस राइटिंग को नाटक में तब्दील किया ।
संजीव- जिस काम के लिए आप देश-दुनिया में मशहूर हैं....कहीं मुंतज़र ज़ैदी आपकी फिल्म में.....(बीच में ही रोकते हुए)
भट्ट- नहीं । नहीं ।  मुंतज़र एक क्रांतिकारी है। एस सोशल वर्कर है। और मुझे लगता नहीं कि उसका कोई इरादा है । मुझसे जुड़ने का (मेरी फिल्म में हीरो बनने का....)
संजीव- आपकी नज़र में खरे उतरते हैं मुंतज़िर (भट्ट साहब की फिल्म में संभावित हीरो की नज़र से)
भट्ट- नहीं मैने कभी इस नज़र से सोचा ही नहीं। हम किस्म के शख्स को जब देखते हैं, वो दूसरी तरह से देखते हैं।
संजीव- आपकी वो कौन सी नज़र है ? जरा खुलकर बतायें...
भट्ट- मंच पर अभिनय करने की जो समझ होती है । वो अलग होती है। दरअसल ज़िंदगी में एक क्रांतिकारी का रोल निभाने के लिए एक अलग ज़ज्बा चाहिए।
संजीव- मुंतज़र ज़ैदी महेश फट्ट की फिल्म के हीरो नहीं हो सकते , लेकिन क्या आप मुंतज़र की ज़िंदगी पर फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं  ?
भट्ट- मेरे ख्याल में नाटक (द लास्ट सैल्यूट ) अपने आप में एक सम्पूर्ण माध्यम है। मुझे लगता है इसी के जरिये जो हम सोच रहे हैं, वो  हमारी कोशिश के जरिये (नाटक) ही पूरा हो जायेगा ।
संजीव- नया क्या धमाका कर रहे हैं आप इन्डिया में ?
भट्ट- फिलहाल इसी (मुंतज़र और उन पर लिखे नाटक द लास्ट सैल्यूट के मंचन ) को जी रहा हूं । इसी को सपोर्ट कर रहा हूं ।
संजीव- महेश भट्ट साहब को खुलवाना मुश्किल है...कुछ तो खुलकर बोलिये...
भट्ट- नहीं । मैंने अपनी ज़िंदगी को खुली किताब की तरह खोलकर दिखाया है दुनिया को । आज भी वही कर रहा हूं।
संजीव- क्या मुंतज़र अल ज़ैदी को उसकी सर-ज़मीं (इराक) का गांधी मानते हैं ?
भट्ट- आज की तारीख में नहीं ।
संजीव- क्यों ?
भट्ट- क्योंकि गांधी की सोच से अब भी ये (मुंतज़र) कोसों दूर है ।
संजीव- भारत से वापिस जाने के बाद मुंतज़र को अपने देश में क्या कुछ फायदा मिलेगा ?
भट्ट- शायद एक नई सोच लेकर जाए । और आने वाले कल में एक पीसफुल-रिवोल्यूशन क्या होता है ? इसकी शुरुआत वहां (इराक) जाकर करे ।
संजीव- मुंतज़र अल ज़ैदी की पहचान है बुश पर जूता फेंकने वाले के रुप में । इसी के बाद दुनिया में जूता- कल्चर शुरु हुआ । आप इसको किस तरह से देखते हैं ?
भट्ट- मैंने कहा न, कि उसकी (मुंतज़र ) उम्र का लिहाज करना चाहिए  । एक नौजवान इंसान है ।
संजीव- क्या आप मुंतज़र के जूता फेंकने की बात को सही मानते हैं ? उसकी वकालत कर रहे हैं !
 भट्ट- नहीं संजीव भाई । सुनिये तो पूरी बात । बोलने भी तो दीजिए मुझे...आप जबाब पूरा होने से पहले ही पकड़ लेते हैं मुझे ।
संजीव- जी, जी । बोलिये, बताईये !
भट्ट- मैं मुंतज़र के जूता फेंकने की वकालत नहीं कर रहा । न ही उसे सही मानता हूं। मैं ये कहना चाहता हूं, अगर आप मुझे बोलने का मौका दें तो, कि मुंतज़र ने जो भी किया बेबसी और लाचारी में किया । उसने अपने आक्रोश का इज़हार किया था ।
संजीव- यानि फिर वही मुंतज़र का बचाव.....?
भट्ट- संजीव भाई नहीं । मैं न वकील हूं, न अदालत । मैं सिर्फ महेश भट्ट हूं । उसने (मुंतज़र) अपने देश (इराक) पर बम बरसते देखे हैं। अपनों को बम धमाकों में मरते, बिलखते- तड़पते देखा है । उसका वही अहसास, इजहार था , किसी के ऊपर (जॉर्ज बुश का नाम लिये बिना ) जूता फेंकना । जो शायद मुंतज़र के अंदर से जागा था ।
संजीव- क्या इज़हार के इस गलत तरीके पर मुंतज़र काबू नहीं रख सकते थे  ?
भट्ट- माफ करें चौहान साहब । मैं आपके सवाल से बिल्कुल सहमत नहीं हूं । जो हालात इराक में पैदा हुए या किये गये थे, उनमें किसी नौजवान (मुंतज़र का नाम लिये बिना ) से ये उम्मीद करना कि वो अपने आप पर लगाम लगा सकता था, तो शायद ये हमारी नादानी होगी ।   
संजीव- मुंतज़र से आपकी लम्बी बातचीत हुई होगी । आप फैमलियर हैं उससे । क्या मुंतज़र ने अपनी जेल-यात्रा के बारे में आपसे खुलकर बातचीत की ?
भट्ट- नहीं । मुझे लगता है आदमी वही  और उतना ही बताता है, जो और जितना वो बताना चाहता है। और जब रिश्ते मजबूत होते हैं, तो आप अपने आप उसका इज़हार करना शुरु कर देते हैं ।
संजीव-  मुंतज़र अल ज़ैदी क्या आज के अपने वतन  (इराक) के हीरो हैं आपकी नज़र में ?
भट्ट- शायद कुछ पॉकेट्स में हैं । पूरे अरब वर्ल्ड में अभी उसे (मुंतज़र) हीरो  का दर्जा दिया नहीं गया है ।
संजीव- अगर महेश भट्ट उसे (मुंतज़र को) अपने प्लेटफार्म पर जगह दे दें, तो शायद हीरो बन जाये ?
भट्ट- नहीं । मुझे लगता है कि ये (महेश भट्ट और बॉलीवुड) का प्लेटफार्म ही अलग है ।   
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