"शस्त्र लाइसेंस जारी करने से पहले "राइफल-क्लब" की फीस-वसूली गैर-कानूनी है। अमूमन सूबे के सभी जिलों में यह काम हो रहा है। राज्य सरकार और जिलों के जिलाधिकारी राइफल क्लब फीस-वसूली प्रक्रिया तुरंत बंद करना/ कराना सुनिश्चित करें।"
इलाहबाद उच्च न्यायालय की एक डबल-बेंच ने यह एतिहासिक फैसला एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए सुनाया। जनहित याचिका धीरज सिंह ने अपने अधिवक्ता एसपीएस परमार के जरिये दाखिल की थी। याचिकाकर्ता का कहना था, कि यूपी के तकरीबन सभी जिलों में खेल प्रोत्साहन और राइफल क्लब फीस के नाम पर शस्त्र धारकों से वसूली की जा रही है। बिना राइफल क्लब की फीस जमा किये, शस्त्र लाइसेंस जारी ही नहीं होता है। इस काम को जिला-अधिकारी (डीएम) की देखरेख/दिशा-निर्देश/ निगरानी में किया जाता है।
