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Saturday, 24 August 2013

पसीना-पसीना बंद कमरों के बादशाह....

हमने सबकी ले ली, तुम हमारी तो नहीं लोगे...? 

-संजीव चौहान-
टीवी-18 ग्रुप के न-मुराद मालिकान ने सीएनएन, सीएनवीसी आवाज और आईबीएन7 ने करीब 350 कर्मचारियों की रोजी-रोटी छीनकर हलकान कर दिया। मालिकों के एक इशारे पर यह काम किया उनके "पालतूओं" किसी राजदीप सरदेसाई और किसी आशुतोष गुप्ताओं ने। कंपनी मालिकों ने पूछा था दोनो से, कि चैनल का घाटा पूरा करने का रास्ता खोजो। बहुत दिन से तुम लोग कंपनी की कमाई पर मस्ती कर रहे हो। मालिक की बात शत-प्रतिशत सही थी। कंपनी की दौलत पर मौज में यही दोनो थे। बाकी तो बिचारे परिवार-पेट पालने के लिए नौकरी कर रहे थे।
मालिकों ने दोनो से ऐसी डिमांड कर डाली, जिसकी उम्मीद आशुतोष और राजदीप को ख्वाब में भी नहीं थी। यह बिचारे तो खाने-कमाने और सरकार की जत्थेदारी में लीन थे। बाकी दुनिया को लात मारकर। धूनी रमाये बैठे थे। कई साल से चैनल की कुर्सी पर। बिना इस चिंता के कि मालिक किसी दिन इनके पर काटने के लिए भी छुरा हाथ में थाम लेगा। इन्हें लगता था, कि अब मालिक इनके आगे नाग रगड़ेगा। इनकी खुशामद करेगा। यह सोचकर कि जैसे धन्नासेठ के खुदा यही हो चले हैं। दंभ में बिचारे भूल गये कि, समय बलवान है। यह भी भूल गये कि जब वक्त पलटता है, तो सोने और शिव की लंका को भी नहीं बख्शता। रावणों की खैर कौन मनाये।

Monday, 19 August 2013

मोटी पगार राजदीप सरदेसाई-आशुतोष तुम्हारी है, ज़मीर बाकी हो तो मार दो नौकरी को लात

-हमने अपनी दो गर्दन बचाने के लिए 200 काट लीं-
मीडिया में इन दिनों एक मीडिया हाउस पब्लिक और मीडिया के बीच 'मारा-मारी' का मीडिया बना हुआ है। नाम है टीवी-18 और इसका अड्डा है..नोएडा फिल्म सिटी में। इस परिवार के दो भाई हैं। नाम है- सीएनएन और आईबीएन-7....सीएनएन का उस्ताद कोई राजदीप सरदेसाई और आईबीएन-7 का आशुतोष गुप्ता नाम का प्राणी बताया जाता है। गाहे-बगाहे दोनो की ही गिनती भारतीय मीडिया मठाधीशों में भी होती है। काबिलियत की वजह से नहीं। मीडिया, राजघरानों और सत्ता की गलियों में इनकी 'जुगाड़' के चलते। इनके अधीन दोनो ही चैनल किसी वरिष्ठ पत्रकार के हों ऐसा भी नहीं है। दोनो के दोनो ही भारत के धंधेबाज (व्यवसायिक) घरानों की नौकरी करते हैं। बदले में मोटी पगार (लाखों)लेते हैं। हांलांकि कि ऐसा नहीं है, कि यही बिचारे मोटी पगार ले रहे हों। इनकी तरह मीडिया को और भी तमाम 'बिचारे' हैं, जो मोटी पगार पर बंधुआ मजदूरी करते हैं। मतलब मालिक (चैनल फाइनेंसर) जो कहेगा, वो करना इनकी मजबूरी है। वरना मालिक इनसे कह देगा...भागो चैनल से अगर हमारी मजदूरी करना तुम्हें नहीं जरुरी है। 
खैर छोड़िये। इन दोनो के मालिकों ने इन्हें इस कदर हड़का दिया है इन दिनों...कि इन्हें नौकरी के लाले पड़े हैं। सो इन्होंने जल्दबाजी में अपनी पगार-परिवार सलामत रखने के लिए एक ऐसा "ज़हर-बुझा" नुस्खा खोजा है, जिसे अमल में आते ही....सैकड़ों परिवार चौराहे पर खड़े हो गये हैं। दोनो उस्तादों ने अपनी पगार और परिवार की सलामती का वास्ता देकर, कल तक इन्हीं के वफादार रहे, अनगिनत वफादारों और उनके परिवारों को इन्होंने 'दांव' पर लगा दिया है। मतलब अपनी पगार की खातिर दोनो उस्तादों ने अपने से नीचे वालों को, जिनकी पगार ((तन-खा) एक लाख से ऊपर है, उनकी नौकरी 'चबाना' शुरु कर दिया है। ठीक वैसे ही जैसे हाथी मुंह में गन्ना चबाता है। वजह सिर्फ वही कि चैनल घाटे में है। खर्चे बढ़ गये हैं। मुनाफा तेल हो चुका है।
मालिक का डंडा इनके सिर की तरफ घूमा। सो अपना सिर बचाकर इन्होंने अपने नीचे वालों के सिर मालिक के डंडे के नीचे दे पटके। बिलकुल वैसे ही जैसे अचानक सामने आये सांप को इंसान मार डालने के लिए एकजुट होकर टूट पड़ते हैं। 
परमप्रिय कथित रुप से मेरे आदरणीय इन दोनो ही मीडिया के कथित मठाधीशों ने यह तक विचार करना मुनासिब नहीं समझा, कि अपनी पगार पचाने-बचाने के लिए आज जिस तरह और जिनके सिर यह कलम कर रहे हैं, उन्हीं की दम पर सीएनएन में राजदीप सरदेसाई 'राजदीप' बन सके और आईबीएन-7 में परम आदरणीय आशुतोष गुप्ता आज 'डंके की चोट पर खुद को आशुतोष' कह पा रहे हैं। जिनके आज यह दोनो अपने पेट-परिवार की खातिर सिर कलम करके 'बलि' ले रहे हैं या ले चुके हैं, अगर दोनो चैनलों के शुरुआती दौर में, वे ही लोग इनके सिर कलम कर चुके होते, तो आज जो यह दोनो हैं, वह शायद कभी न होते।